Digital Filmmaking

DIGITAL FILMMAKING डिजिटल फिल्म मेकिंग :(INTRODUCTION)

DIGITAL FILMMAKING

1990s के बाद दुनिया के कई देशो में फिल्म मेकिंग के टेक्नोलॉजी में बदलाव होना शुरू हो गया था |
काफी ऐसे प्राइवेट फिल्म मेकिंग कंपनी इस टेक्नोलॉजी के ऊपर रिसर्च करने में जुट गए थे |
DIGITAL FILMMAKING ‘डिजिटल फिल्म मेकिंग” का मतलब है फिल्ममेकिंग से रिलीजिंग तक होने वाले डिजिटल टेक्नोलॉजी का प्रयोग |

अब सवाल ये है की

‘डिजिटल फिल्म मेकिंग’ (DIGITAL FILMMAKING) टेक्नोलॉजी’ आने से पहले फिल्म कैसे बनती थी?

पिछले 100 सालों से चली आ रही फिल्म निर्माण की जो कला थी वो काफी कठिन और काफी लागत वाली थी,
जो हर किसी के लिए संभव नहीं था | पारम्परिक तरीके से फिल्म बनाने में जो कैमरा उपयोग होता था
वो (35mm फिल्म स्टॉक) रील वाला कैमरा होता था | इसको एडिट करने की तरीके भी काफी कठिन
और उलझा हुआ होता था |

उस टाइम ‘स्पेशल इफेक्ट्स’ जैसे की ‘आग’ दिखाना हो फिल्म में तो
वो वास्तविक में फिल्म सेट पे आग लगाना परता था | अगर किसी सीन में ब्लास्ट दिखाना हो तो वो भी फिल्म सेट पे ही करना होता था जिसमे रिस्क बहुत होता था | इन सब चीजों की वजह से फिल्म निर्माता को अपनी बहुत बड़ी प्राइवेट प्रॉपर्टी लेनी होती थी और फिर वहाँ पे सेट बनाया जाता था
जो काफी महगी हुआ करती थी |उस समय फिल्म निर्देशक के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होता था
फिल्म में निवेश करने वाले को ढूढ़ना | फिर फिल्म रिलीजिंग की बात करे तो वो भी फिल्म

फिल्म इंडस्ट्री में निवेश

थिएटर तक ही सिमित था जिसमे फिल्म निर्माता को रिकवरी मिलने का मौका बहुत कम होता था |
बड़े-बड़े उद्योगपति ही इस इंडस्ट्री में निवेश करने में सक्षम होते थे हर किसी के लिए संभव नहीं था |
और यही वजह था की उस समय बहुत कम गिने चुने फिल्मकार हुआ करते थे |
जब प्रॉब्लम होती है तो उसका उपाय भी मिलता है| काफी सारे देशो में इसके ऊपर काम शुरू हो गया था
की कैसे इन सारी कठिनाइयों से बचा जाये, और वही से शुरू हुआ इस DIGITAL FILMMAKING का दौर |

डिजिटल फिल्म मेकिंग में ये सभी कठिनाइयाँ कैसे ख़त्म हुई ?

सबसे बड़ा बदलाव कैमरे में हुआ जो पिक्चर पहले( 35mm Film stock) रील पे शूट होती थी
वही अब डिजिटल कैमरा में डिजिटल इमेज सेंसर्स की मदद से पिक्चर शूट होने लगी ।
दोनों की क्वालिटी में भी बहुत ज्यादा फर्क आया और सबसे बड़ी बात ये की
रील वाले कैमरा में स्टोरेज की कमी हो जाती थी क्यों की रील का कीमत भी ज्यादा होता था
और एक बार रील उपयोग हो गया तो दुबारा उसे उपयोग में नहीं लाया जा सकता था।यहाँ पे स्टोरेज भी डिजिटल हो गया |
डिजिटल कैमरा में हार्ड -ड्राइव/मेमोरी कार्ड इस्तेमाल होता है और एक बार फिल्म बनने
और रिलीज़ होने के बाद उस मेमोरी कार्ड/हार्ड -ड्राइव को फॉर्मेट कर दुबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है |

एडिटिंग :

फिल्म शूट होने के बाद उसकी एडिटिंग होती है | एडिटिंग का मतलब होता है
वीडियो या ऑडियो का वो हिस्सा जो उपयोग में नहीं हो जैसे अगर कोई वीडियो रिकॉर्ड हुई
उसमे जब तक कैमरा को ऑफ किया गया तब तक कुछ सेकंड की एक्स्ट्रा वीडियो भी रिकॉर्ड हो गई तो
उस एक्स्ट्रा पार्ट को हटाना ही एडिटिंग कहलाती है|

एक सवाल यहाँ पे फिर से उभर के आता है –

डिजिटल फिल्म मेकिंग प्रक्रिया के पहले जो पारम्परिक फिल्म मेकिंग की प्रक्रिया थी
वीडियो-टेप (रील) के ऊपर जो वीडियो रिकॉर्ड होती थी उसकी एडिटिंग कैसे होती थी ?
और अभी डिजिटल फिल्म मेकिंग में हार्ड-डिस्क/मेमरी कार्ड के माध्यम से वीडियो को स्टोरेज की जाती है
तो उसको कैसे एडिटिंग की जाती है ?

लीनियर वीडियो एडिटिंग (एनालॉग ) :

पारम्परिक वीडियो एडिटिंग की प्रक्रिया जो सालों से चली आ रही थी वो कुछ इस तरह थी-
जब फिल्म शूट हो जाता था तब उस रील को VTR -Machine में लगाया जाता था।
उसके बाद शॉट और सीन के हिसाब से वीडियो को एडिट करने के लिए रील को कट किया जाता था।
फिर जो पार्ट वीडियो में नहीं दिखाना है उस पार्ट को कट कर के बीच से अलग कर दिया जाता था

और फिर ग्लू या cello-tape की मदद से जोड़ दिया था। ये एकदम पुराने ज़माने की फिल्म एडिटिंग की प्रक्रिया थी ।
ऐसा नहीं है की एकदम से सबकुछ बदल गया, और हमलोग पारम्परिक फिल्ममेकिंग की दुनिया से सीधे डिजिटल हो गए।
ऐसा बिलकुल नहीं हुआ काफी सारे बदलाव हुए और VTR (वीडियो टेप रिकॉर्डर),
VCR (वीडियो कैसेट रिकॉर्डर) VCD (वीडियो कॉम्पैक्ट डिस्क), डीवीडी-प्लेयर ये सारे ज़माने से होते हुए
आज इस डिजटल फिल्म मेकिंग के दौर में पहुंचे हैं ।

नॉन लीनियर वीडियो एडिटिंग :

नॉन-लीनियर वीडियो एडिटिंग की प्रक्रिया अभी के डिजिटल फिल्म मेकिंग में प्रचलन में आया |
नॉन लीनियर एडिटिंग में ओरिजिनल फुटेज को बिना छेड़-छार किये एडिटिंग किया जाता है |
फिल्म को हार्ड-डिस्क या मेमोरी कार्ड से वर्कस्टेशन के कंप्यूटर में कॉपी कर लिया जाता है
और फिर उसको नॉन-लीनियर सॉफ्टवेयर की मदद से एडिट करते हैं|
इसमें ओरिजनल फुटेज के ऊपर कोई इफ़ेक्ट नहीं आता है |

फिल्म रिलीज :

अगर फिल्म रिलीज की बात करे तो उसमे भी काफी कुछ बदलाव आया |
पारम्परिक फिल्म मेकिंग में रिलीज भी फिल्म रील प्रोजेक्टर के माध्यम से होता था |
धीरे धीरे ये तकनीक भी बदलते गया और डिजिटल फिल्ममेकिंग के दौर में
डिजिटल सिनेमा प्रोजेक्शन तकनीक का प्रयोग होने लगा |मुख्य रूप से सैटेलाइट के माध्यम से
सिनेमा घरो में फिल्म रिलीज़ होता है | वही होम डिस्ट्रीब्यूशन की बात करे तो
पहले सीडी/ डीवीडी के माध्यम से लोगो के घर तक फिल्म पहुँचता था वहीं
अब ऑनलाइन के माध्यम से डिस्ट्रीब्यूट होता है.

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